Organic Farming in Hindi: जैविक खेती किसे कहते हैं, जैविक खेती के लाभ, जैविक खेती के बारे में जानकारी

जैविक खेती

खेती करने की वह विधि होती है, जिसमें संश्लेषित उर्वरकों एवं संश्लेषित कीटनाशकों का उपयोग न्यूनतम रूप से किया जाता है तथा जो भूमि की उर्वरता क्षमता को बनाए रखने के लिए फसल चक्र, हरी खाद, कंपोस्ट आदि का प्रयोग किया जाता है, उसे जैविक खेती कहा जाता है। विश्व में जैविक उत्पादों का बाजार काफी हद तक बढ़ चुका है।

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Organic Farming in Hindi (जैविक खेती)

जैविक खेती की परिभाषा: ऐसी कृषि जिसमें लंबे समय व स्थिर उत्पादन प्राप्त करने के लिए कारखानों में निर्मित रसायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, खरपतवारनाशी तथा वृद्धि नियंत्रक आदि रसायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया जाता है और हरी खाद गोबर आदि का इस्तेमाल किया जाता हो तथा मिट्टी एवं पर्यावरण प्रदूषण से नियंत्रित हो ऐसी खेती जैविक खेती कहलाती है।

जैविक खेती  कैसे करें (विधि)

जैविक खेती करने के लिए खेत की तैयारी:- जैविक खेती करने के लिए खेतों में रसायनिक और अन्य हानिकारक उर्वरकों के स्थान पर जैविक खाद जैसे गोबर कंपोस्ट आदि का इस्तेमाल किया जाता है। गोबर की खाद बनाने के लिए 3 फीट चौड़ा और 5 फीट गहरा तथा 15 से 20 फुट की लंबाई वाला गड्ढा खोदकर एक प्लास्टिक का तिरपाल बिछा दे। फिर उस खड्डे में फलों सब्जियों के अवशेष आदि डालकर उस पर गोबर तथा पशुओं के मूत्र आदि डाल दीजिए। गोबर डालकर गड्ढे को पूरा भर दे ध्यान रहे, कि वह पूरा नम ना हो । अब गड्ढे को अच्छी तरीके से ढक दें। 20 दिन के पश्चात खड्डे में अच्छी तरह से हिलाये। 2 महीने में 4 बार इस मिश्रण को अच्छी तरह से जरूर हिलाए। अब आपका जैविक खाद बनकर तैयार हो जाएगा। 90 से 120 दिन के अंदर आपका जैविक खाद तैयार हो जाता है। जैविक खाद का आप खेतों में छिड़काव करें।

केंचुआ खाद

मैदा की उर्वरता और उत्पादक क्षमता बनाए रखने के लिए मिट्टी में पोषक तत्वों को संतुलित बनाए रखना आवश्यक होता है। खेतों में केंचुआ खाद डालने से मिट्टी के पोषक तत्व में बढ़ोतरी होती है । यह मिट्टी की उर्वरकता क्षमता बढ़ाते हैं। केंचुआ खाद में नाइट्रोजन फास्फोरस (nitrogen phosphorus) और पोटाश (potash) के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। केंचुआ खाद बनाने के लिए आपको एक गड्ढा खोदना होगा। उस गड्ढा में सूखे पत्ते , गोबर की खाद आदि डालना होगा और आपकी खाद कुछ ही दिन में बनकर तैयार हो जाएगी। 1 एकड़ जमीन पर खेती करने के लिए 2 से 3 टन केंचुआ खाद की आवश्यकता होती है। केंचुआ खाद बनाने की विधि पूरी जाने। 

Organic Farming in Hindi

हरी खाद: हरी खाद का इस्तेमाल जैविक खेती करने के लिए किया जाता है। हरी खाद की सहायता से जैविक खेती करने के लिए जिस खेत में आपको खेती करनी है, उस खेत में वर्षा के समय में अधिक बढ़ने वाली सनई, लोबिया, गवार आदि उगा कर उनको 40 से 60 दिन के पश्चात हल से जुताई कर के खेत में ही रहने देना चाहिए। ऐसा करने से खेत को हरी खाद मिलती है। ऐसा करने से खेत में नाइट्रोजन स्थिरीकरण जल भंडारण की क्षमता बढ़ती है। इस प्रकार आप हरी खाद की सहायता से जैविक खेती कर सकते हैं।

कृषि अथवा Agriculture लैटिन भाषा का शब्द है, जो एग्रीकल्चर शब्दों तथा कल्चर नामक शब्दों से मिलकर बना है । एग्रीकल्चर में एग्रिक का अर्थ होता है और कल्चर का अर्थ कर्षण होता है। एग्रीकल्चर का संपूर्ण अर्थ मृदा का कर्षण होता है। कृषि को हम कला, विज्ञान या वाणिज्य भी कह सकते हैं । कृषि कला, विज्ञान या वाणिज्य तीनों का योग है। कृषि की कई परिभाषाएं होती है । फसल उत्पादन, फलोत्पादन, पशुपालन व भूमि पर विविध खेती करने की विभिन्न प्रक्रियाओं को कृषि कहा जाता है। कृषि करने के लिए मनुष्य को परिश्रमी होना चाहिए केवल तब ही वह एक किसान बनकर खेती कर सकता है।

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Organic Farming in Sikkim

सिक्किम भारत का पहला ऐसा राज्य है, जहां 100 फ़ीसदी जैविक खेती की जाती है। जैविक खेती करने के लिए सिक्कम को ग्लोबल फ्यूच पॉलिसी अवार्ड की श्रेणी में स्वर्णिम पुरस्कार भी दिया गया है। सिक्किम भारत का ही नहीं बल्कि पुरे विश्व का पहला जैविक राज्य बना है। सिक्किम भारत का एक ऐसा राज्य है, जहां रसायनिक कीटनाशकों तथा उर्वरकों का इस्तेमाल किए बिना खेती की जाती है। सिक्किम का कुल क्षेत्रफल 7,29,900 हेक्टर है। उसमें से केवल 10.20% क्षेत्र यानी 74303 क्षेत्र ही कृषि योग्य है बाकी क्षेत्र में वन, बेमौसम भूमि के, शीत मरुस्थल और अल्पाइन क्षेत्र आदि के अंतर्गत आते हैं। ऑर्गेनिक फार्मिंग करने से सिक्किम में लगभग 66,000 किसान लाभन्विन्त हुए है।

जैविक खेती करने से सिक्किम में पर्यटन में 50 % मुनाफा भी हुआ है। यह अपने पर्वतीय परिस्थितिकी तंत्र तथा समृद्ध जैव विविधता के कारण वैश्विक पर्यटन के लिए एक उत्तम स्थान माना जाता है। सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग जी ने वर्ष 2016 में रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था और उपयोग करने पर ₹1,00,000 तक का जुर्माना तय किया था। भारत सरकार के द्वारा ऑर्गेनिक मिशन को सफल बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे है। इस प्रकार यह भारत का पहला जैविक राज्य बना है। यहां के लोग रसायनिक कीटनाशकों का उपयोग किए बिना अनेक प्रकार की सब्जियां फल आदि उगाते हैं।

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Organic Farming in Rajasthan

राजस्थान के जयपुर जिले से सटे दादिया गांव को राज्य का पहला जैविक गांव बनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री आदर्श गांव योजना के अंतर्गत किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित करते हुए इस गांव में जैविक खेती की जाती है। राज्य सरकार के द्वारा जैविक खेती परियोजना को अपनाने के लिए कार्यशाला का भी आयोजन किया गया है। जैविक खेती परियोजना राजस्थान को 10 जिलों में संचालित की जा रही है। इस कार्यशाला में किसानों को बताया जाएगा कि वर्मी कंपोस्ट, जीवामृत खाद का इस्तेमाल कर खेती कैसे की जाती है और बिना रसायनों रसायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग किए जैविक खेती कैसे करें।

कृषि के प्रमुख चार घटक होते हैं

  • फसल उत्पादन: फसल उत्पादन कृषि का सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। घटक में धान, गेहूं, जौ दलहन सब्जिया जैसी विभिन्न प्रकार की फसलों का उत्पादन किया जाता है। यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता जैसे रोटी, कपड़ा, मकान आदि की पूर्ति करता है ।
  • बागवानी : कृषि के इस घटक में बागवानी में विभिन्न प्रकार के खाद्य सुरक्षा, औषधि उद्देश्य, सौंदर्य संतुष्टि जैसे पौधों की खेती की जाती है। बागवानी में छाया, सजावटी, एवेन्यू जैसे बागवानों की स्थापना तथा पौधे लगाए जाते हैं।
  • पशुपालन: पशुपालन भी कृषि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। पशुपालन व्यापार का एक अच्छा साधन बन सकता है। मास, अंडा, चमड़ा, दूध आदि आवश्यक सामग्री को प्राप्त करने के लिए पशुपालन किया जाता है। गाय भैंस पालन, बकरी पालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन आदि कार्य करते हैं। यह सभी पशुपालन का हिस्सा होते हैं।
  • कृषि वानिकी: कृषि वानिकी भी कृषि एक अहम हिस्सा का होता है, जिसमें फसल उत्पादन तथा वनों को संतुलित बनाए रखने के लिए खेती करने का कार्य किए जाते हैं। कृषि वानिकी के जरिए लोग इस्तेमाल की जाने वाली फसलों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के वनों से उपयोगी वस्तुएं जैसे लकड़ी आदि प्राप्त करते हैं।

जैविक कीटनाशी (Biopesticides)

जैविक रसायन (बायो-पेस्टीसाइड) का निर्माण फफॅूदी, बैक्टीरिया विषाणु तथा वनस्पति पर आधारित किसतनाशको से फसलों, सब्जियों एवं फलों आदि को बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जैविक रसायन (Biopesticides) का स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है।

जैविक एजेन्ट (Bio-Agent)

इसमें मुख्य रूप से परभक्षी (Predator) यथा प्रेइंग मेन्टिस, इन्द्र गोप भृंग, ड्रोगेन फ्लाई, किशोरी मक्खी, क्रिकेट (झींगुर), ग्राउन्ड वीटिल, मिडो ग्रासहापर, वाटर वग, मिरिड वग,क्राइसोपर्ला, जाइगोग्रामा बाइकोलोराटा, मकड़ी आदि एवं परजीवी (Parasite) यथा ट्राइकोग्रामा कोलिनिस, कम्पोलेटिस क्लोरिडी, एपैन्टेलिस, सिरफिड लाई, इपीरीकेनिया मेलानोल्यूका आदि कीटो से होने वाले फसल नुकसान से बचाने का कार्य करते हैं। यह कीटों एवं खरपतवार को खाते हैं। इसमें कुछ को लेबोरेटरी में पालकर खेतों में छोड़ा जाता है। परन्तु कुछ कीट ऐसे होते है जिनका प्रयोगशाला स्तर पर अभी पालन सम्भव नहीं हो पाया है, उन्हें खेत/फसल वातावरण में संरक्षित किया जाता है। वस्तुत मकड़ी कीट वर्ग बायो-एजेन्ट में सम्मिलित नहीं है। अधिनियम में Bio-Agents कीटनाशी अभी तक रजिस्टर नहीं है। बायो-एजेन्ट की गुणवत्ता, गुण नियंत्रण प्रयोगशाला के द्वारा सुनिश्चित नहीं की जाती है।

ट्राइकोडरमा विरिडी/ट्राइकोडरमा हारजिएनम

ट्राइकोडरमा घुलनशील जैविक फफॅूदीनाशक है। ट्राइकोडरमा विरडी 1%W.P., 1-15%W.P., तथा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2% W.P. के बाजार में आसानी से उपलब्ध होते है। ट्राइकोडरमा का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के फसलों, फलों एवं सब्जियों में जड़, सड़न, तना सड़न डैम्पिंग आफ, उकठा, झुलसा आदि फफॅूदजनित रोगों के लिए किया जाता है। ट्राइकोडरमा धान, गेंहूँ, दलहनी फसलें गन्ना, कपास, सब्जियों, फलों आदि में रोगो से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके कवक तंतु फफूंदी के कवकतंतुओं को लपेट कर या सीधे अन्दर जाकर उनको जड़ से ख़त्म कर देते हैं।

इसके अलावा, ट्राइकोडरमा भोजन स्पर्धा के तहत विषाक्त पदार्थ का निर्माण करते हैं, जो बीजों /फलो के चारों ओर सुरक्षा दीवार बनाकर हानिकारक फफूंदी से सुरक्षित रखते हैं। बीजों का अंकुरण के समस्य ट्राइकोडरमा का इस्तेमाल बीजोपचार के लिए काफी फायदेमंद होता है। ट्राइकोडरमा का उपयोग करने से फसलें फफूंदजनित रोगों से मुक्त रहती हैं। ट्राइकोडरमा के बाद आपको फसल की बुवाई के बाद तथा पहले रासायनिक फफूंदीनाशक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ट्राइकोडरमा का जीवन चक्र सामान्य तापक्रम पर एक वर्ष का होता है।

Organic Farming Schemes in India 

जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना (National Project on Organic Farming-NPOF)

 जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना केंद्र सरकार के द्वारा चलाई जा रही है। जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजनाको 10 वीं वर्ष की योजना में 1 अक्टूबर 2004 से पायलट परियोजना के रूप में क्रियान्वित किया गया था। जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत केंद्र सरकार के द्वारा लगभग 57.04 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया था। जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना के तहत 12 वीं वर्ष की योजना में जारी है। जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत सभी किसानो की क्षमता निर्माण के जरिये जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु शुरू की गई है ।

जैविक आदानों में अनुसंधान और विकास के लिए तकनीकी सहायता भी जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजनाका एक अहम हिस्सा थी इस योजना के तहत बाजार विकास और जैविक उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला के उद्देश्य से निर्बाध कारोबार सुनिश्चित किया जाता है । जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना के तहत कम लागत वाली प्रमाणन प्रणाली के लिए भागीदारी गारंटी योजना (Participation Guarantee Scheme) को भी सम्मिलित किया गया है । जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत जैव-उर्वरक उत्पादन इकाइयों और कृषि-अपशिष्ट खाद उत्पादन इकाइयों के लिए केंद्र सरकार के द्वारा वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाती है । जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता क्रमशः 50% और 40 लाख रुपये की सीमा तक जैव-उर्वरक उत्पादन इकाइयों और 33% और 60 लाख रुपये कृषि-अपशिष्ट खाद उत्पादन इकाइयों के लिए प्रदान की जाती थी ।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन (National Horticulture Mission)

राष्ट्रीय बागवानी मिशन केंद्र सरकार के द्वारा चलाई जा रही है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन का मुख्य उद्देश्य जैविक खेती करनेके लिए आर्थिक सहायता प्रदान करना, वर्मी-कम्पोस्ट इकाइयों का निर्माण और जैविक प्रमाणीकरण है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन की वित्तीय वर्ष 2005-06 में बागवानी उत्पादन को बढ़ाने के लिए शुरुआत की गयी थी । राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत अंडमान और निकोबार और लक्षद्वीप, और उत्तर-पूर्व के राज्यों, सिक्किम, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्य में लागु नहीं की गई है । राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत वर्मी-कम्पोस्ट उत्पादन इकाइयों के लिए प्रति किसान 30,000 रुपये की सीमा तक 50% की वित्तीय सहायता तथा छोटे किसानो को 4,000 रुपये प्रति हेक्टेयर और 50 हेक्टेयर के क्षेत्र पर जैविक खेती करने वाले किसानों के समूह के लिए जैविक खेती प्रमाणन के लिए 5 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता राशि प्रदान की जाती है।

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राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (Rashtriya Krishi Vikas Yojna)

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की शुरआत 29 मई 2007 में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के विकास करने के लिए की गई थी। कैबिनेट के द्वारा 1 नवंबर, 2017 को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत 15722 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटित किया गया था ।राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत खाद्य फसलों, मृदा स्वास्थ्य, उत्पादकता, एकीकृत कीट प्रबंधन, बागवानी, वर्षा आधारित कृषि प्रणालियों के विकास और जैव उर्वरकों का विकास किया जायेगा।

मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना (National Project on Management of Soil Health and Fertility)

मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना केंद्र सरकार के द्वारा चलाई गयी है। मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना को 11 वीं पंच वर्षीय योजना के दौरान क्रियान्वित की गयी है । मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत मृदा स्वास्थ्य और उत्पादकता को सुधारने के लिए जैविक खादों और उर्वरकों के सही इस्तेमाल के साथ रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोग के जरिये एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management) को समर्थन तथ बढ़ावा दिया गया है।मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना के तहत मृदा परीक्षण सुविधा में सुधार और किसानों को मृदा स्वास्थ्य में सुधार के लिए जानकारी प्रदान करना और गुणवत्ता सुनिश्चित करना , उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण सुविधा आदि प्रदान किया जाता है। मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता के प्रबंधन पर राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत सरकार के द्वारा मृदा स्वास्थ्य कार्ड भी बनाये जाते है और मृदा के स्वास्थ्य की जाँच करवाने के लिए प्रयोगशालाओं का भी निर्माण किया गया है ।

जैविक खेती पर नेटवर्क प्रोजेक्ट (Network Project on Organic Farming)

जैविक खेती पर नेटवर्क प्रोजेक्ट वर्ष 2004-2005 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के साथ मिलकर ( with Indian Institute for Farming Systems Research) कृषि प्रणाली अनुसंधान के लिए शुरू किया गया है । जैविक खेती पर नेटवर्क प्रोजेक्टके अंतर्गत विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में जैविक खेती कर उत्पादकता, लाभप्रदता, स्थिरता, गुणवत्ता और विभिन्न फसलों और फसल प्रणालियों आधी पर ध्यान दिया जायेगा, जिससे मिट्टी प्रबंधन के विकल्प विकसित करना और फसलों के उत्पादन बढ़ाने के लिए और लागत प्रभावी तरीको को विकसित किया जायेगा।

परम्परागत कृषि विकास योजना (Paramparagat Krishi Vikas Yojna)

परम्परागत कृषि विकास योजना नेशनल मिशन ऑफ सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (NMSA) के मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के अंतर्गत आती है। परम्परागत कृषि विकास योजना 50 एकड़ या इससे अधिक भूमि वाले 50 किसानों के समूह के लिए शुरू की गयी है। परम्परागत कृषि विकास योजना एक क्लस्टर दृष्टिकोण के आधार पर कार्य करती है। परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत प्रमाणित जैविक खेती के जरिए जैविक उत्पादन को बढ़ावा दिया जाता है। परम्परागत कृषि विकास योजना के तहत जैविक खेती प्रमाणीकरण का पूरा खर्च सरकार के द्वारा वहन किया जायेगा और देश में जैविक उत्पादन को बढ़ावा दिया जायेगा।

मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन (Mission Organic Value Chain Development for North Eastern Region- MOVCDNER):

मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन नेशनल मिशन फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के अंतर्गत केंद्र सरकार के द्वारा चलाई गयी है। मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन की 12 वीं योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा राज्यों में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के द्वारा लागु की गई । मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन का मुख्य उद्देश्य एक मूल्य-श्रृंखला का निर्माण करना है जहां उपभोक्ता व उत्पादकों को जोड़ा जाए है। मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ ईस्टर्न रीजन के अंतर्गत संग्रह, भंडारण, प्रसंस्करण, विपणन और ब्रांड निर्माण के लिए इनपुट, बीज, प्रमाणीकरण और निर्माण आदि के लिए संपूर्ण मूल्य श्रृंखला का निर्माण किया जायेगा और वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाएगी।

Organic Farming Certificate

जैविक प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आपको 30 दिन के लिए जैविक खेती करने हेतु प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। प्रशिक्षण प्राप्त करने पश्चात् आपको जैविक खेती प्रमाण पत्र प्रदान कर दिया जायेगा। जैविक खेती प्रमाण पत्र प्राप्त करने हेतु आपको सबसे पहले आवेदन पत्र भर कर राष्ट्रीय जैविक खेती बोर्ड की ई-मेल आईडी पर जमा करना होगा।

आवेदन पत्र PDF: Click Here

E-mail ID: nbdc@nic.in

पता: हापुड़ रोड, सीबीआई अकादमी के पास, सेक्टर 19, कमला नेहरू नगर, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश 201002

सम्पर्क सूत्र: 0120-2764212 , 0120- 2764906

जैविक खेती प्रमाण पत्र हेतु अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे।

ट्राइकोडरमा का इस्तेमाल कैसे करे

बीज अंकुरण के लिए 4 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति किग्रा. बीज दर से बीजोपचार करने के पश्चात् बुवाई करनी चाहिए।
5 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति लीटर पानी की दर से घोलकर बनाकर कन्द एवं नर्सरी के पौधों की जड़ को भिगो कर बीजोपचार करने के पश्चात्त बुवाई/रोपाई करनी चाहिए।

मिट्टी को सुधारने के लिए 2.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर ट्राइकोडरमा को 75 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छिड़काव करके 8-10 दिन तक छाया में रख देना चाहिए। बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई के समय इस खाद को मिट्टी में मिला देना चाहिए।

प्रति पौधा 100 ग्राम ट्राइकोडरमा को 8-10 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर 8-10 दिन बाद तैयार ट्राइकोडरमा युक्त् गोबर की खाद को बहुवर्षीय पौधों की जड़ के चारों तरफ 1-2 फीट चौड़ा एवं 2-3 फीट गहरा गड्ढ़ा खोदकर मिट्टी में मिलाकर गड्ढ़ों की भराई करनी चाहिए।

खड़ी फसल में फफूँदीजनित रोग को नियंत्रण करने के लिए 2.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से ट्राइकोडरमा का 400-500 लीटर पानी में घोलकर बना ले । फिर शाम के समय फसलों पर छिड़काव करें। 15 दिन के अंतराल में जरूरत पड़ने पर दुबारा छिड़काव कर सकते है।

ब्यूवेरिया बैसियाना

ब्यूवेरिया बैसियाना एक फफूंदीनाशक जैविक कीटनाशक है। ब्यूवेरिया बैसियाना 1% WP, एवं 1-15% W.P का मिश्रण बाजार में आसानी से उपलब्ध है जिनका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के फसलों, फूलों एवं सब्जियों में लगने वाले फलीबेधक, पत्ती लपेटक, पत्ती खाने वाले कीट, चूसने वाले कीटों, भूमि में दीमक एवं सफेद गिडार आदि की रोकथाम के लिए किया हैं। यह अधिक आर्द्रता एवं कम तापक्रम वाले मौसम में अधिक प्रभावी होते है। फसलों में ब्यूवेरिया बैसियाना का उपयोग करने से पहले और बाद में रासायनिक फफूंदीनाशक का उपयोग नहीं करना चाहिए। ब्यूवेरिया बैसियाना का जीवन चक्र एक वर्ष का होता है।

ब्यूवेरिया वैसियाना का इस्तेमाल कैसे करे

मिट्टी की क्षमता को सुधारने के लिए ब्यूवैरिया वैसियाना की 2.5 किग्रा. प्रति हैक्टर के दर से 75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर खेत में आखिरी जुताई के समय डाल कर जुताई करवानी चाहिए।
2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर बनाकर खड़ी फसल में कीट रोकथाम के शाम के समय छिड़काव करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर 15 दिन के पश्चात् आप पुनः इस घोल का छिड़काव कर सकते है।

स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स

स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स एक बैक्टीरिया रोधी जैविक फफूंदीनाशक/ जीवाणुनाशक है। स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स 5% WP के बाजार में आसानी से उपलब्ध है जिनका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के फसलों, फलों, सब्जियों एवं गन्ना में जड़ सड़न, तना सड़न डैम्पिंग आफ, उकठा, लाल सड़न, जीवाणु झुलसा, जीवाणुधारी आदि फफूँदजनित एवं जीवाणुजनित रोगों के नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। स्यूडोमोनास का इस्तेमाल 15 दिन पूर्व या बाद में रासायनिक बैक्टेरीसाइड का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स का जीवन चक्र एक वर्ष का होता है।

स्यूडोमोनास फ्लोरिसेन्स का इस्तेमाल कैसे करे ?

बीजोपचार के लिए 10 ग्राम स्यूडोमोनास को 15-20 मि.ली. पानी में मिलाकर गाढ़ा घोल (स्लरी) बना करके प्रति किग्रा. दर से बीज को उपचारित करके छाया में सुखाने के पश्चात् बुवाई करनी चाहिए।
नर्सरी में पौधों को उपचारित करने के लिए 50 ग्राम स्यूडोमोनास को 1 लीटर पानी की दर से घोल (स्लरी) तैयार कर फोड़ो या फिर एक वर्ग मी. क्षेत्रफल के क्यारियों में छिड़काव करना चाहिए जिससे मिट्टी में जनित रोगों से फसलों का बचाव किया जा सकता है।

मिट्टी के सुधार के लिए 2.5 किग्रा. स्यूडोमोनास प्रति हेक्टेयर 10-20 किग्रा. महीन पिसी हुई बालू में मिलाकर बुवाई/रोपाई से पहले उर्वरकों की तरह छिड़काव कर सकते है। 2.5 किग्रा. स्यूडोमोनास को 100 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर 5 दिन रखने के पश्चात् बुवाई से पहले मिट्टी में मिलाना चाहिए।

मेटाराइजियम एनिसोप्ली

मेटाराइजियम एनिसोप्ली फफूँदनाशक जैविक कीटनाशक है। मेटाराइजियम एनिसोप्ली 1-15% W.P. एवं 1-5% W.P. बाजार में आसनी से उपलब्ध है जिनका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के फसलों, फलों एवं सब्जियों में लगने वाले फलीबेधक, पत्ती लपेटक, पत्ती खाने वाले कीट, चूसने वाले कीट, भूमि में दीमक एवं सफेद गिडार आदि रोगो के नियंत्रण के लिए किया जाता हैं। यह कम आर्द्रता एवं अधिक तापक्रम पर अधिक असरदार होते है। फसल पर इसका इस्तेमाल करने के 15 दिन पहले एवं बाद में रासायनिक फफूंदीनाशक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मेटाराइजियम एनिसोप्ली का अपना जीवनचक्र एक वर्ष का होता है।

मेटाराइजियम एनिसोप्ली का इस्तेमाल कैसे करे ?

मिटटी की क्षमता सुधररने के लिए मेटाराइजियम एनिसोप्ली को 2.5 किग्रा. प्रति हैक्टर के दर से 75 किग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर खेत की अन्तिम जुताई के समय मिट्टी में मिलाना चाहिए।
खड़ी फसल में 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर बनाकर कीट नियंत्रण के लिए शाम के समय छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल आप दुबारा मेटाराइजियम एनिसोप्ली के घोल का छिड़काव कर सकते है।

वर्टीसीलियम लैकानी

वर्टीसीलियम लैकानी फफूंदीनाशक जैविक कीटनाशक है। वर्टीसीलियम लैकानी 1-15% W.P बाजार में आसानी से उपलब्ध है जिनका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के फसलों में चूसने वाले कीटों तथा सल्क कीट, माहू, थ्रिप्स, जैसिड, मिलीबग आदि के रोग नियंत्रण के लिए किया जाता हैं। वर्टीसीलियम लैकानी का इस्तेमाल करने के 15 दिन पहले तथा बाद में रासायनिक फफूंदीनाशक का उपयोग नहीं करना चाहिए। वर्टीसीलियम लैकानी स्वयं का जीवनचक्र एक वर्ष का होता है।
वर्टीसीलियम लैकानी का इस्तेमाल कैसे करे ?

खड़ी फसल में 2.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में वर्टीसीलियम लैकानी का घोलकर बनाकर किट नियंत्रण के लिए शाम के समय फसल पर छिड़काव करे। आवश्यकतानुसार 15 दिन के पश्चात् दुबारा छिड़काव कर सकते है।

बैसिलस थूरिनजियेन्सिस (B.T.)

बैसिलस थूरिनजियेन्सिस बैक्टीरियारोधी जैविक कीटनाशक है। बैसिलस थूरिनजियेन्सिस प्रजाति कर्सटकी, 5% डब्लू.पी. का इस्तेमाल फसलों, सब्जियों एवं फलों में लगने वाले लेपिडोप्टेरा कुल के फली बेधक, पत्ती लपेटक, पत्ती खाने वाले कीटों को नियंत्रित करने के लिए लाभकारी है। रासायनिक बैक्टेरीसाइड का उपयोग बैसिलस थूरिनजियेन्सिस इस्तेमाल करने के 15 दिन पहले या बाद में नहीं करना चाहिए। बैसिलस थूरिनजियेन्सिस का जीवनचक्र एक वर्ष का होता है।

बैसिलस थूरिनजियेन्सिस का इस्तेमाल कैसे करे?

कीट नियंत्रण करने के लिए 0.5-1.0 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में बैसिलस थूरिनजियेन्सिस का घोलकर शाम के समय छिड़काव करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर 15 दिन के अंतराल पर शाम के समय दुबारा छिड़काव करना चाहिए।

न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वायरस (N.P.V.)

एन.पी.वी. वाइरस जीवाणुरोधी जैविक कीटनाशक है। इसे चना की सूंडी और तम्बाकू की सूंडी से बनाया जाता है। के बना हुआ जैविक कीटनाशक 2% A.S. चने की सूंडी बना होता है तथा जैविक कीटनाशक 0-5% A.S. तम्बाकू की सूंडी से बना हुआ होता है। यह बाजार में आसानी से उपलब्ध होते है। चने की सूंडी से निर्मित एन.पी.वी. कीटनाशक चने की सूंडी पर ही असर करता है। एन.पी.वी. का जीवनचक्र एक वर्ष का होता है।

न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वायरस कैसे इस्तेमाल करे?

कीट रोकथाम के लिए 250-300 लारवा के समतुल्य (एल.ई.) प्रति हेक्टेयर की दर से 400-500 लीटर पानी में न्यूक्लियर पालीहेड्रोसिस वायरस घोलकर बनाकर शाम के समय छिड़काव करे। जरूरत पड़ने पर 15 दिन के अंतराल पर दुबारा छिड़काव करना चाहिए।

एजाडिरेक्टिन (नीम आयल)

एजाडिरेक्टिन वानस्पति जैविक कीटनाशक है। एजाडिरेक्टिन 0.03,0.15,0.3,0.5,1.0 एवं 5% E.C. आदि बाजार में आसानी से उपलब्ध होते है। एजाडिरेक्टिन का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के फसलों, सब्जियों एवं फलों में पत्ती खाने वाले, पत्ती लपेटने वाले, चूसने वाले, फली बेधक आदि कीटों के नियंत्रण करने के लिए किया जाता है। एजाडिरेक्टिन का इस्तेमाल करने से कीटों में खाने की अनिक्षा पैदा होती है और इससे कीट दूर भागते है। अण्डों से सूंडियॉ निकलने के के तुरंत पश्चात् एजाडिरेक्टिन का छिड़काव करना काफी फायदेमंद होता है। एजाडिरेक्टिन का स्वयं का जीवन चक्र एक वर्ष का होता है।

एजाडिरेक्टिन कैसे इस्तेमाल करे?

कीट नियंत्रण अथवा कीट से फसलों को बचने के लिए एजाडिरेक्टिन 0.15% E.C. की 2.5 ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर मिला कर छिडककव करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर 15 दिन के अंतराल में शाम के समय पुनः छिड़काव कर सकते है।

जैविक एजेण्ट (परजीवी एवं परभक्षी)

ट्राइकोग्रामा कोलिनिस, क्राइसोपर्ला, जाइगोग्रामा वाइकोलोराटा, गंधपाश (फेरोमोन ट्रैप), सिरफिड लाई, कम्पोलेटिस क्लोरिडी, ब्रैकन, अपेन्टेलिस, इपीरीकेनिया मेलानोल्यूका आदि परजीवी कीट का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की फसलों, सब्जियों एवं गन्ना के खेतों में पाये जाने वाले कीटों के लारवा, शिशु एवं प्रौढ़ को अन्दर ही अन्दर खाकर प्राकृतिक रूप से कीट का नियंत्रण कर सकते है। परजीवी कीटों का संरक्षण कर आप जैविक रूप से कीटो को नियंत्रित कर सकते है।